भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाण भारती।
तस्यां हि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्॥

Tuesday, June 2, 2026

१४५८. न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्षं स तं सदा निन्दति नाsत्र चित्रम‌् ।

१४५८. न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्षं  स तं सदा  निन्दति नाsत्र चित्रम‌् । 

यथा किराती करिकुम्भलग्नां मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुञ्जाम् ॥


अर्थ :-  एखाद्या श्रेष्ठ व्यक्तीचे उत्तम गुण न कळल्याने (सामान्य माणूस त्याची सारखी निंदा करतो) यात काहीच नवल नाही. हत्तीच्या गंडस्थळावरचा (अमूल्य असा) मोती टाकून देऊन भिल्ल स्त्रीला जसं गुंजेची फळ (वेणीत) गुंफावीशी वाटतात तसंच (हे निंदा करणं) आहे.


Hindi Translation (हिंदी अनुवाद)

"यदि किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के उत्तम गुणों को न समझ पाने के कारण (कोई सामान्य मनुष्य लगातार उसकी निंदा करता है), तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे कोई भील महिला हाथी के मस्तक से निकले (अमूल्य) गजमुक्ता (मोती) को फेंक कर, उसकी जगह गूंजे के फलों (चिरमिटी के दानों) को अपनी वेणी (बालों) में पिरोना पसंद करती है।"


English Translation (अंग्रेजी अनुवाद)

"It is not at all surprising if an ordinary person constantly criticizes a great individual because they fail to understand their noble qualities. It is just like a tribal (Bhilla) woman who throws away the priceless pearl obtained from an elephant's forehead, choosing instead to weave cheap gunja seeds (rosary peas) into her hair."

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