भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाण भारती।
तस्यां हि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्॥

Friday, June 12, 2026

१४६८. पिता रत्नाकरो यस्य ल‌क्ष्मी: यस्य सहोदरी ।

१४६८. पिता रत्नाकरो यस्य ल‌क्ष्मी: यस्य सहोदरी । 

शङ्खो भ्रमति भिक्षायै फलं कर्मानुसारत:॥


अर्थ :- 

अमृत मिळवण्यासाठी देवदानवांनी समुद्रमंथन केले, त्यामधून निघालेल्या शंखा बद्दल हा श्लोक आहे.

रत्नांची खाण असणारा (समुद्र) ज्याचा पिता आहे, (साक्षात) लक्ष्मी ज्याची सख्खी बहिण आहे असा शंख भिक मागण्यांसाठी दारोदार भटकतो. (पूर्वी व वाईट) काम केल्यामुळे त्याचा परिणाम त्याला भोगावा लागतो आहे.


हिंदी अनुवाद 

अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और दानवों ने समुद्र मंथन किया था, यह श्लोक उसी मंथन से निकले शंख के बारे में है। 

रत्नों की खान (समुद्र) जिसके पिता हैं, और (साक्षात) लक्ष्मी जिसकी सगी बहन हैं, ऐसा शंख भीख मांगने के लिए दर-दर भटकता है। (पूर्व में किए गए बुरे) कर्मों के कारण उसे यह परिणाम भुगतना पड़ रहा है।

English Translation

The gods and demons churned the ocean (Samudra Manthan) to obtain the nectar of immortality (Amrit), and this verse is about the conch shell (Shankha) that emerged from it. 

Even though the ocean, which is a treasure trove of gems, is its father, and Goddess Lakshmi herself is its real sister, this conch shell wanders from door to door begging for alms. It is suffering this consequence due to its past bad deeds.

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