१५०२. वलिभिर्मुखमाक्रान्तं पलितैरङ्कितं शिर:।
गात्राणि शिथिलायन्ते , तृष्णैका तरुणायते॥
अर्थ :- मनुष्यस्वभावाबद्दल कवींनी हा श्लोक रचला आहे. म्हातारपण इतकं झाले आहे की, (सर्व) तोंडभर सुरकुत्या पडलेल्या आहेत, मस्तक पांढऱ्या केसांच्या ताब्यात गेले आहे (म्हणजे काळा केस उरलेला नाही एवढे वय वाढले आहे) अवयव काम करत नाहीसे झाले आहेत. (इतके म्हातारपण येऊन, सर्व अवयवांची कार्यक्षमता कमी होत असली तरी) हावरे पण ही एक च गोष्ट ( कमी न होता) तरुण होते आहे. (माणूस मरायला टेकला तरी त्याचा लोभ कमी न होता उलट वाढत जातो.)
हिंदी अनुवाद
कवियों ने मनुष्य के स्वभाव पर यह श्लोक रचा है। बुढ़ापा इतना बढ़ चुका है कि पूरे चेहरे पर झुर्रियां पड़ गई हैं, सिर पूरी तरह से सफेद बालों के कब्ज़े में आ गया है (अर्थात एक भी काला बाल नहीं बचा है), और शरीर के सभी अंग निष्क्रिय हो चुके हैं। (इतना बुढ़ापा आने और अंगों की क्षमता कम होने के बावजूद) केवल यह 'लालच/तृष्णा' ही एक ऐसी चीज़ है जो कम होने के बजाय और भी तरुण (युवा) होती जा रही है। (अर्थात मनुष्य मृत्यु के निकट पहुँच जाए, तब भी उसका लोभ कम होने के बजाय बढ़ता ही जाता है।)
English Translation
"Poets have composed this verse depicting human nature. Old age has advanced to the point where the entire face is covered in wrinkles, the head is completely taken over by white hair (meaning not a single black hair remains), and the body parts have lost their ability to function. (Despite such extreme old age and diminishing physical capacity), 'greed/desire' is the only thing that, instead of fading, keeps becoming younger and stronger. (A person may be on the verge of death, yet their greed does not diminish; rather, it continues to grow.)
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